विधालय

विधा के मंदिर का  वो रास्ता याद आता है ,  विद्यार्थियों से घिरा वो विधा का आलय याद आता है ।
सुबह की प्यारी नींद से जगाने पर माँ पर ग़ुस्सा करना याद आता है फिर जल्दी से तैयार हो पिताजी के साथ स्कूटर पर बैठ स्कूल जाना याद आता है ।
सुबह की प्रार्थना कर राष्ट्रगान गाना याद आता है , फिर क़तार में लगकर शिक्षकों को सुप्रभात कर कक्षा की शुरूआत करना याद आता है ।
कालांशो के समाप्त होकर आधी छुट्टी की घंटी बजने का वो इंतज़ार याद आता है , माँ के हाथ का बना वो खाने का डिब्बा याद आता है ।
परीक्षा की घड़ी में माँ का आशीर्वाद व पिता का सिखाया हुआ पाठ याद आता है , फिर परीक्षा परिणाम का डरभरा इंतज़ार का क्षण याद आता है ।
पिंक व गोल्डन कार्ड के वितरण पर  स्वयम् के नाम की घोषणा की पहर याद आती है , फिर परिक्षा परिणाम के उत्तम होने पर चेहरे पर सुकून भरी दिव्य मुस्कान याद आती है ।
राखी , दीपावली , होली  की त्योहारों के अवकाशों से लेकर शीतकाल – ग्रीष्मकालीन तक की वो छुट्टी याद आती है ।
कितना अपनापन था शिक्षकों की उस डाँट में , कापी के  पन्नों पर मिले वो सितारों वाली वो छोटी छोटी सफलता याद आती है ।
याद आता है उस शिक्षा संकुल का वो  प्रांगण  , जहाँ सींची थी ज़िंदगी की नींव , जहाँ बनी थी पक्की सहेलियाँ , जहाँ  सीखा था , जीवन के खट्टे मिठठे पलों को बँटोरना ।
कितना प्यारा सा था वो ख़्वाहिशों भरा सफर , जहाँ डॉक्टर , इंजीनियर बनकर जीतनी थी भविष्य की दुनिया ।
माँ की सीखभरी डाँट व पिता का हर शाम बैठाकर जीवन के उतार -चढ़ाव की समझ से भी ज़्यादा याद आता है शिक्षक का सबके सामने वो जीवन मूल्यों का पाठ पड़ाना ।
आज सफलता के इस जश्न में सब शामिल हुऐ हैं , फिर भी फीकीं सी लगती है गुरूजी बिन यह महफ़िल ।
आज भी जूलाई का वो माह याद आता है , नयी किताबों , नये बस्ते , नयी कक्षा वाला वो स़मा याद आता
विधा का वो आलय याद आता है …………पंख 🧚🏻‍♀️😊