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प्रकृति

आँगन में दो दोस्त कुछ बुदबुदा रहे थे , पास जाकर देखा तो नीम और शीशम कुछ बतला रहे थे ।
मैं (बया़ पक्षी ) चुपके से उनकी छाँव में जा बैठी , आँख धरा पर व कान उनकी वार्ता पर लगा सुन रही थी ।
कर रहे थे वो अपने बचपन की बातें , जहाँ थी सिर्फ़ हरियाली और स्वच्छता की कहानी ।
नीम ने सुनाये अपने जीवन के बचपन के दिन , जहाँ चहुँओर थी हरीतिमा संग गिलहरी की पकड़धम ।
कितनी प्यारी थी वो नन्ही दुनिया जहाँ कलकल करती नदियाँ किनारे दिखती पंखों वालों की दुनिया ।
हरे भरे मुस्कुराते से पत्तों की डाली पर बैठी कोयल की मधुर सी आवाज़ , वही पास की डाली पर खिलती कच्ची कलियों की सुगंधित बहार ।
वहीं इठलाता सा भँवरा नज़र आता था , मेरे आँगन में बैढे हर जीव का मन बहलाता था ।
रात की रानी की खुशबु से हर कोना आँगन का महक जाता था , वहीं चंदन की काठी से हर पत्ते पत्ते का रोम रोम सुगंधित हो जाता था ।
हर मौसम का अपना ही एक आंनद था, बसंत में नये पुष्पों व मल्हार में नहाकर चमकने का प्रकृति का अतभुत संगम था ।
मोर पंख फैला कर जब नाचता था , मानो हर पौधा भी मन की सारंगी व टहनी संग मरदंग बजाता था ।
कितना सुकून मिलता था उस बुढे बरगद की पेड़ की छांव में जहाँ , अनगिनत चिड़ियाओं का बसेरा था , वानरों की धमाचौकड़ी का डेरा था ।
स्वच्छ हवा , पावन धरा , नीला आकाश , निर्मल जल , चारों ओर फैली हरी भरी पेड़ों की दुनिया में पनपती पक्षियों की नन्ही बस्तियाँ थी ।
ना वो हरा पन रहा ना वो नन्ही दुनिया , ना मोर मुस्कुरा रहा है, ना वो बुढ़ा बरगद कहीं नज़र आ रहा है ।
सिर्फ़ ईंटों के यह मंज़र नज़र आ रहे हैं , जिनके नीचे दफ़्न हुऐ हमारे बचपन के नज़ारे दफ़नाये जा रहे हैं ।
ना निर्मल आसंमा है , ना वो कलकल करती सरिता नज़र आ रही है , बस धुऐं के छल्ले व फ़ैक्टरियों से निकलते गंदे नाले हमें देख मृत्यु के द्वार पर मुस्कुरा रहे हैं ।
क्या हो गया है इस मानुष को , क्यों भुल गया अपनी ही माँ ( धरती )को ।सब विलुप्त सा होता जा रहा है , चिड़ियाओं का वो ढेरा कहीं नहीं नज़र आ रहा है ।
माँ के आँचल में दुखी हो कर रो पड़ें वो दो जीव(नीम व पीपल) , यह कहकर अलविदा कर गये कि क्या पता कल दिख पायेंगे या नहीं ।
बस ईमारतों और चिमनियों की दुनिया नज़र आएगी , धुंऐ और शोर में ही मानव की दुनिया सिमट जाऐगी।
उनकी अंतिम मुलाक़ात सुन मैं (बया़ )सहम उठी , रो रहा था आँगन का मंज़र , अंदर से काँप रही थी , बस कर ऐ मानव बहुत हो गया तेरा अत्याचार ।
थोड़ा तो डर इस प्रकृति के ख़ौफ़ से , सब मिट गया है इस स्वर्ग सी वसुधा की गोद से , बस तू ( मानव )रह गया है घमंडी सा , अब तो सँभल जा , अपनी माँ ( धरती ) की देखभाल में लग जा ।
बचा ले इस चमन के विलुप्त होते जीवों को , फिर से हरा भरा कर दे , माँ के आँगन को , उस प्यारी सी दुनिया को । 🧚🏻‍♀️😊पंख

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